"NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter 7 - साखियाँ एवं सबद: भावार्थ और प्रश्नोत्तर"

"NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter 7 - Sakhiyan and Sabad: Explanation and Questions & Answers"

कबीर दास की साखियाँ-

कबीर दास की साखियाँ दोहा छंद में रची गई हैं, जो "आँखों देखी" अनुभव को दर्शाती हैं। यह शब्द संस्कृत के "साक्षी" से लिया गया है, जिसका मतलब है किसी चीज को प्रत्यक्ष रूप से देखना या अनुभव करना। कबीरदास जी ने अपनी साखियों में भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर जोर दिया है।

इन साखियों में कबीरदास हमें बताते हैं कि इस संसार में मनुष्य को कैसे रहना चाहिए और कैसे ईश्वर को बिना बाहरी आडंबरों के प्राप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार, सच्चा सुख केवल ईश्वर भक्ति में है, जो सच्चे ज्ञान के साथ ही संभव है। कबीर की साखियाँ भक्ति और ज्ञान के उपदेशों का संकलन हैं जो हमें सरल और सच्चे जीवन की दिशा दिखाती हैं।

साखियाँ का भावार्थ -

👉मानसरोवर सुभग जल , हंसा केलि कराहि। 

     मुकताफल मुकता चुगै , अब उड़ी अनत न जाही।१।


भावार्थ –

यह एक दोहा छंद है। 

कैलाश पर्वत पर स्थित मानसरोवर झील का जल पूरी तरह से स्वच्छ और निर्मल है, जहाँ हंस (पक्षी)निवास करता है। हंस उसी मानसरोवर झील में मोती जैसे दानों का सेवन करता है और आनंद से क्रीड़ा करते हुए अपना जीवन व्यतीत करता है। हंस को उस झील से बाहर जाने की आवश्यकता या इच्छा नहीं होती।


कबीरदास जी ने इस दोहे में इसी भावना को व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि जब मनुष्य ईश्वर भक्ति में पूरी तरह से डूब जाता है, तब उसका हृदय भी निर्मल हो जाता है। इस स्थिति में, जब मनुष्य हृदय रूपी मानसरोवर में साधना रूपी क्रीड़ा कर रहा होता है और भक्ति रूपी मोती चुगकर आनंदित हो रहा होता है, तो फिर वह ईश्वर की भक्ति को छोड़कर कहीं और जाने की इच्छा नहीं करता।


दूसरे शब्दों में, जब किसी व्यक्ति का मन ईश्वर भक्ति में लग जाता है, तो उसे सांसारिक इच्छाओं, मोह-माया, और बाहरी आडंबरों से कोई संबंध नहीं रह जाता। उसे केवल ईश्वर भक्ति में ही सच्चा आनंद और खुशी मिलती है, और वह भक्ति के मार्ग को छोड़कर किसी अन्य मार्ग पर नहीं जाना चाहता। इस दोहे में शांत रस का प्रभाव प्रकट किया गया है।


👉प्रेमी ढ़ूँढ़त मैं फिरौं , प्रेमी मिले न कोई। 
     प्रेमी कों प्रेमी मिले , सब विष अमृत होइ।२।


भावार्थ –

कबीरदास जी कहते हैं कि वे अपने प्रेमी (ईश्वर) को हर जगह खोजते फिर रहे हैं, लेकिन उन्हें कहीं भी उनका प्रेमी (ईश्वर) नहीं मिल रहा है।


कबीरदास जी का कहना है कि यदि उन्हें उनके ईश्वर के रूप में प्रेमी मिल जाए, तो उनके मन का सारा विष (दुख और कठिनाई) अमृत (सुख) में बदल जाएगा। इसका अर्थ है कि भगवान की भक्ति के माध्यम से ही सभी दुखों का अंत होता है और सुख की प्राप्ति होती है।


👉हस्ती चढ़िए ज्ञान कौं , सहज दुलीचा डारि। 
     स्वान रूप संसार है , भूँकन दे झक मारि।३।


भावार्थ –

कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा ज्ञान के हाथी पर साधना के आसन (गलीचा) को बिछाकर सवारी करनी चाहिए।


वे उदाहरण देते हैं कि जैसे हाथी कुत्तों के भौंकने की परवाह किए बिना अपनी मस्ती में आगे बढ़ता है, वैसे ही इस संसार के लोग भी आपको अच्छा या बुरा कहेंगे। आपको उनकी बातों को अनसुना करते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए। समय के साथ, वे सभी थक हारकर चुप हो जाएंगे। यहां कबीरदास जी ने संसार की तुलना भौंकने वाले कुत्तों से की है, यह दर्शाते हुए कि दूसरों की बातों को नजरअंदाज करके हमें अपने मार्ग पर चलते रहना चाहिए।


👉पखापखी के कारने , सब जग रहा भुलान।
निरपख होई के हरि भजै , सोई संत सुजान।४।

भावार्थ –
कबीरदास जी बताते हैं कि इस दुनिया के लोग पक्ष और विपक्ष के झगड़ों में इतने उलझे हुए हैं कि वे अपने असली प्रेमी, अर्थात ईश्वर, को पूरी तरह भूल चुके हैं। जो व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के, निष्पक्षता से और पूरी भक्ति के साथ ईश्वर की आराधना करता है, वही सच में सच्चा भक्त और अच्छा इंसान होता है। ऐसे लोग दूसरों के झगड़ों से दूर रहते हैं और अपनी भक्ति में लीन रहते हैं।

👉हिंदु मूआ राम कहि , मुसलमान खुदाई। 
      कहै कबीर सो जीवता , दुहूँ के निकटि न जाइ।५।

भावार्थ –
कबीरदास जी के इस दोहे में वे बताते हैं कि हिंदू लोग राम का नाम लेते हुए और मुसलमान खुदा का नाम लेते हुए अपना सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं, लेकिन फिर भी दोनों ही सच्चे रूप में न ईश्वर को जानते हैं और न खुदा को। इस तरह, अंत में उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता है। 

कबीरदास जी के अनुसार, जो व्यक्ति इन सब धर्मों और भेदभावों से दूर रहता है, वही सच में जीवित है और उसका जीवन सार्थक है। उनका यह संदेश है कि मनुष्य को जाति, पांति और धर्म के भेदभाव से बचना चाहिए। सही मायनों में वही व्यक्ति जीता है जो ईश्वर की भक्ति में लीन रहता है।

👉काबा फिरि कासी भया , रामहिं भया रहीम। 
      मोट चुन मैदा भया , बैठी कबीरा जीम।६।

भावार्थ –
कबीरदास जी के इस दोहे में वे बताते हैं कि मनुष्य चाहे काबा में जाकर ईश्वर को ढूंढे, या काशी जाकर, या फिर राम के नाम से पुकारे या रहीम के नाम से, सभी जगह ईश्वर एक समान हैं। 

वे उदाहरण देते हैं कि जैसे गेहूं को मोटा पीसने पर वह आटा बन जाता है और अगर उसे बारीक पीसते हैं तो वह मैदा बन जाता है। लेकिन इन दोनों रूपों में गेहूं का उपयोग खाना बनाने के लिए ही होता है। इसी प्रकार, ईश्वर को आप किसी भी नाम से पुकारें, वह एक ही हैं। फिर चाहे आप उन्हें काबा में ढूंढें या काशी में, अंततः सभी नाम और स्थान एक ही सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।

👉ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होई। 
     सुबरन कलस सुरा भरा , साधु निंदा सोई।७।

भावार्थ –
कबीरदास जी के इस दोहे में वे स्पष्ट करते हैं कि ऊंचे कुल में जन्म लेना किसी व्यक्ति को ऊँचा नहीं बनाता, बल्कि उसके कर्म ही उसकी असली पहचान बनाते हैं। 

उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जैसे सोने के घड़े में रखी शराब हमेशा शराब ही रहेगी, वो अमृत नहीं बन सकती। भले ही वह सोने के घड़े में हो, एक साधु उसे बुरी चीज मानकर उसकी निंदा करेगा। इसी तरह, अगर कोई व्यक्ति ऊँचे कुल में जन्म लेकर भी बुरे कर्म करता है, तो लोग उसके कुल की परवाह नहीं करेंगे और उसकी निंदा करेंगे। 

इसलिए, कबीरदास जी का संदेश है कि व्यक्ति को अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यही उसे महान बनाते हैं।


सबद (पद) का भावार्थ -


👉 मोकों कहाँ ढ़ूँढ़े बंदे , मैं तो तेरे पास में।
     ना मैं देवल ना मैं मस्जिद , ना काबे कैलास में।
     ना तो कौने क्रिया -कर्म में , नहीं योग वैराग में।
     खोजी होय तो तुरते मिलिहों , पल भर की तलास में।
     कहें कबीर सुनो भाई साधो , सब स्वासों की स्वास में।

भावार्थ –
कबीर दास जी की इन पंक्तियों में वे स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर हर जगह मौजूद हैं, लेकिन मनुष्य अपनी अज्ञानता के कारण उनकी खोज में भटकता रहता है। कभी वह मंदिरों में जाता है, कभी मस्जिदों में, और कभी काबा या कैलाश की ओर निकल पड़ता है, ईश्वर को पाने के लिए। 

इसके लिए वह पूजा-पाठ, तंत्र-मंत्र करता है, या साधु का चोला पहनकर वैराग्य धारण कर लेता है। इस प्रकार, वह अपना जीवन ईश्वर की खोज में व्यर्थ गंवा देता है, जबकि ये सब बाहरी दिखावे और आडंबर के अलावा कुछ नहीं हैं। 

कबीरदास जी के अनुसार, भगवान तो हर मनुष्य के अंदर, उसकी आत्मा में बसते हैं। वह हर जीव के भीतर विद्यमान हैं। उनसे मिलने के लिए किसी बाहरी आडंबर या कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। यदि मनुष्य सिर्फ अपने अंदर झांककर देखे, तो उसे ईश्वर पल भर में मिल जाएंगे। 

अर्थात, सरल शब्दों में, ईश्वर हर कण में निवास करते हैं। उन्हें खोजने के लिए कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है; बस सच्चे मन से उन्हें देखने की जरूरत है।

👉 संतौं भाई आई ग्याँन की आँधी रे।
       भ्रम की टाटी सबै उड़ाँनी , माया रहै न बाँधी॥
       हिति चित्त की द्वै थूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।
       त्रिस्नाँ छाँनि परि घर ऊपरि, कुबधि का भाँडाँ फूटा।
       जोग जुगति काया का निकस्या, हरि की गति जब जाँणी॥
       आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।
       कहै कबीर भाँन के प्रगटे उदित भया तम खीनाँ॥
भावार्थ –
इन पंक्तियों में कबीरदास जी ने ज्ञान के महत्व को बहुत सरलता से समझाया है। उन्होंने ज्ञान की तुलना एक आंधी से की है। जैसे ही आंधी आती है, कच्ची झोपड़ी की दीवारें अपने आप गिर जाती हैं और वह बंधन मुक्त हो जाती है। इसी तरह, जब किसी व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है, तो उसका मन सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है।

कबीरदास जी आगे बताते हैं कि जब झोपड़ी की दीवारें गिर जाती हैं और छत को संभालने वाला लकड़ी का टुकड़ा, जो खंभे को जोड़ता है, टूट जाता है, तब छत भी अपने आप गिर जाती है। छत के गिरते ही झोपड़ी के अंदर रखा सारा सामान नष्ट हो जाता है।

इसी प्रकार, जब व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है, तो वह सभी विकारों—जैसे लोभ, मोह, लालच, जाति-पाँति और स्वार्थ—से मुक्त हो जाता है। लेकिन जिनका मन मजबूत होता है, यानी जिनके मन में कोई छल-कपट नहीं होता, उन पर आंधी-तूफान का कोई असर नहीं पड़ता। ज्ञानी व्यक्ति को कोई सांसारिक चीज डगमगा नहीं कर सकती।

आंधी के बाद जब बारिश होती है, तो वह सारी गंदगी को धोकर साफ कर देती है। उसी तरह, ज्ञान की प्राप्ति के बाद मनुष्य का मन निर्मल हो जाता है और वह ईश्वर भक्ति में लीन हो जाता है।

NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter -७  साखियाँ एवं सबद : प्रश्नोत्तर 

Sakhiyan and Sabad:Questions &
Answer

(साखियाँ)पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न-१-'मानसरोवर’ से कवि का क्या आशय है?

उत्तर-मानसरोवर के दो अर्थ हैं-

  • एक पवित्र सरोवर जिसमें हंस विहार करते हैं।
  • दूसरा हृदय रूपी तालाब से है जो ईश्वर भक्ति से निर्मल हो चुका है।
प्रश्न 2.कवि ने सच्चे प्रेमी की क्या कसौटी बताई है?

उत्तर -कबीरदास जी का कहना है कि जब उन्हें सच्चे प्रेमी (ईश्वर) का साथ मिल जाएगा, तो उनके जीवन से दुख और कठिनाई का ज़हर दूर हो जाएगा और उनका जीवन सुख के अमृत से भर जाएगा। उनका मन पूरी तरह से पवित्र और निर्मल हो जाएगा। सच्चे प्रेमी के मिलने के बाद उन्हें किसी और से मिलने की चाह नहीं रहेगी, और वे अपने प्रेमी को छोड़कर कहीं और जाना भी नहीं चाहेंगे।

प्रश्न-३-तीसरे दोहे में कवि ने किस प्रकार के ज्ञान को महत्त्व दिया है?

उत्तर-इस दोहे में अनुभव से प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान को महत्त्व दिया गया है।

प्रश्न -४ -इस संसार में सच्चा संत कौन कहलाता है?

उत्तर-इस संसार में सच्चा संत वही है जो जाति-धर्म, संप्रदाय आदि के भेदभाव से दूर रहता है, तर्क-वितर्क, वैर-विरोध और राम-रहीम के चक्कर में पड़े बिना प्रभु की सच्ची भक्ति करता है। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा संत होता है।

प्रश्न-५ -अंतिम दो दोहों के माध्यम से कबीर ने किस तरह की संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है?

उत्तर-अंतिम दो दोहों में कबीर ने निम्नलिखित संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है-

  1. कबीरदास जी पहले दोहे में कहते हैं कि चाहे इंसान ईश्वर को काबा में खोजे या काशी में, या फिर उसे राम के नाम से पुकारे या रहीम के नाम से, ईश्वर सभी के लिए एक ही है। अपने धर्म या पंथ को श्रेष्ठ मानकर दूसरों के धर्म या ईश्वर की निंदा करना एक संकीर्ण सोच को दर्शाता है।
  2. दूसरे दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि किसी ऊँचे कुल में जन्म लेने से मनुष्य महान नहीं बनता, बल्कि उसके कर्म ही उसे ऊँचा बनाते हैं। असली पहचान उसके अच्छे कर्मों से होती है, न कि उसके कुल से। ऊंचे कुल में जन्म लेने मात्र से खुद को श्रेष्ठ मानना एक संकीर्ण सोच को दर्शाता है।
प्रश्न-६ -किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके कुल से होती है या उसके कर्मों से? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर -व्यक्ति की असली पहचान उसके कर्मों से होती है, न कि उसके कुल से। अगर कोई व्यक्ति ऊँचे कुल में जन्म लेकर बुरे कर्म करता है, तो वह निंदा का पात्र बन जाता है। इसके विपरीत, यदि कोई साधारण परिवार में जन्म लेकर अच्छे कर्म करता है, तो वह समाज में सम्मान प्राप्त करता है। सूरदास, कबीर, तुलसीदास और कई ऋषि-मुनि साधारण परिवार में जन्म लेकर भी अपने श्रेष्ठ कर्मों से आदरणीय बने। वहीं, कंस, दुर्योधन, रावण जैसे लोग बुरे कर्मों के कारण निंदा के पात्र बन गए।

प्रश्न 7.काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
                हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।
                स्वान रूप संसार है, भेंकन दे झख मारि।

उत्तर-इस दोहे में कबीरदास जी ज्ञान की महत्ता बताते हैं। वह कहते हैं कि सच्चे ज्ञान की ऊँचाई पर पहुँचकर ही व्यक्ति संसार की झूठी मोह-माया से मुक्त हो सकता है। 

काव्य सौंदर्य: 

1. प्रतीकात्मकता: यहाँ पर "हस्ती" (हाथी) को आत्मज्ञान का प्रतीक बताया गया है, जो अपने आप में शक्तिशाली और स्थिर होता है। ज्ञान को यहाँ ऊँचाई पर चढ़ने के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो आत्म-विकास की यात्रा का संकेत देता है।
   
2.सारगर्भिता: "स्वान रूप संसार" में संसार को कुत्ते (स्वान) के रूप में दिखाया गया है, जो हर छोटी-छोटी बात पर भौंकता है। इससे कबीरदास जी संसार की नश्वरता और उसकी अस्थिरता को समझाते हैं। 

3. व्यंग्य: इस दोहे में कबीरदास जी ने व्यंग्य के माध्यम से कहा है कि संसार की बातों को नजरअंदाज करना चाहिए। जैसे हाथी कुत्तों के भौंकने की परवाह नहीं करता, उसी तरह ज्ञानी व्यक्ति भी संसार की आलोचनाओं और झूठी बातों से प्रभावित नहीं होता।

कुल मिलाकर, इस दोहे का काव्य सौंदर्य ज्ञान के महत्व, प्रतीकात्मकता और व्यंग्य के माध्यम से स्पष्ट होता है।


सबद (पद)पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

प्रश्न-८-मनुष्य ईश्वर को कहाँ-कहाँ ढूँढ़ता फिरता है?

उत्तर-मनुष्य ईश्वर को विभिन्न स्थानों पर ढूँढ़ता फिरता है। कोई उसे काबा में खोजता है, कोई काशी में, तो कोई उसे राम के नाम से पुकारता है, और कोई रहीम के नाम से। लोग अपने-अपने धर्म और मान्यताओं के अनुसार ईश्वर को अलग-अलग जगहों और रूपों में खोजने की कोशिश करते हैं, लेकिन वास्तव में ईश्वर सभी में समान रूप से मौजूद है।

प्रश्न-९-कबीर ने ईश्वर-प्राप्ति के लिए किन प्रचलित विश्वासों का खंडन किया है?

उत्तर-कबीरदास ने ईश्वर-प्राप्ति के लिए प्रचलित कई विश्वासों का खंडन किया है। उन्होंने यह समझाने की कोशिश की है कि ईश्वर किसी विशेष स्थान, मंदिर, मस्जिद, काबा, या काशी में नहीं मिलता, बल्कि वह हर जगह और हर व्यक्ति में मौजूद है। कबीर ने धर्म, जाति और स्थान के आधार पर ईश्वर को बाँधने की संकीर्ण सोच का विरोध किया है। उनके अनुसार, ईश्वर को पाने के लिए बाहरी आडंबरों, धार्मिक स्थानों या विशेष संस्कारों की आवश्यकता नहीं है; सच्ची भक्ति, निर्मल हृदय, और अच्छे कर्मों से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।

प्रश्न-१०-कबीर ने ईश्वर को ‘सब स्वाँसों की स्वाँस में क्यों कहा है?

उत्तर-"सब स्वाँसों की स्वाँस" कहकर कबीरदास जी यह बताना चाहते हैं कि ईश्वर इस पूरे संसार के हर कण में मौजूद है और वह हर व्यक्ति के भीतर समान रूप से बसा है। ईश्वर को मंदिर-मस्जिद में खोजने की बजाय व्यक्ति को उसे अपने भीतर, सच्चे मन से तलाशना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति ईश्वर को सच्चे दिल से याद करता है, तो वह पल भर में उसे पा सकता है।

प्रश्न-११-कबीर ने ज्ञान के आगमन की तुलना सामान्य हवा से न कर आँधी से क्यों की?

उत्तर-कबीर दास जी ने ज्ञान के आगमन की तुलना आँधी से की है, क्योंकि आँधी बहुत तेज़ और प्रभावी होती है। यह अपनी राह में आने वाली सभी रुकावटों को हटा देती है। इसी तरह, ज्ञान भी हमारे जीवन में बदलाव लाता है। जब हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह हमारे अज्ञान को समाप्त करता है और हमें नई सोच और दृष्टिकोण देता है। 

ज्ञान का प्रभाव तुरंत और गहरा होता है, जैसे आँधी के समय सब कुछ हिल जाता है। ज्ञान के आने से हम नई बातें समझते हैं और अपने विचारों में बड़ा परिवर्तन महसूस करते हैं। इस तरह, कबीर दास जी यह बताना चाहते हैं कि जब ज्ञान हमें मिलता है, तो यह हमारी सोच और समझ में एक महत्वपूर्ण बदलाव लाता है, जो जीवन को और बेहतर बनाने में मदद करता है।

प्रश्न-१२-ज्ञान की आँधी का भक्त के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर-ज्ञान की आँधी का भक्त के जीवन पर कई सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं:

1. अज्ञान का नाश: ज्ञान से भक्त का अज्ञान दूर होता है और वह सत्य को समझता है।
 2. बदलाव और विकास: यह भक्त के विचारों में बदलाव लाती है और उसे नई सोच देती है।
3. आत्मज्ञान: भक्त अपने भीतर की शक्ति को पहचानता है और आत्मविश्वास प्राप्त करता है।
4. प्रेम और सहानुभूति: ज्ञान से भक्त में दूसरों के प्रति प्रेम और दया की भावना बढ़ती है।
5. धैर्य और संतोष: ज्ञान से वह कठिनाइयों का सामना कर पाता है और जीवन में संतुलन बनाए रखता है।

इस तरह, ज्ञान की आँधी भक्त के जीवन को और अधिक अर्थपूर्ण और संतोषजनक बनाती है।

प्रश्न-१३-भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) हिति चित्त की वै श्रृंनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।

उत्तर-इस पंक्ति का भाव है कि जब मन शांत और स्थिर होता है, तब मोह और अज्ञान के बंधन टूट जाते हैं। "हिति" का अर्थ है ज्ञान, और "चित्त की श्रृंनी" से तात्पर्य है मन की जंजीरें। इस प्रकार, ज्ञान प्राप्त करने पर व्यक्ति मोह से मुक्त हो जाता है और सच्चाई को समझने में सक्षम होता है।

 (ख) आँधी पीछे जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भीनाँ।

उत्तर-इस पंक्ति का भाव है कि प्रेम जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाता है। "आँधी" से तात्पर्य है बदलते हालात, और "जल बूठा" प्रेम के उभरने का संकेत है। "हरि जन" का अर्थ है भगवान के भक्त। जब प्रेम का अनुभव होता है, तो भक्त एक-दूसरे के प्रति एकजुटता और समर्पण महसूस करते हैं, जो उन्हें कठिनाइयों में भी मजबूत बनाए रखता है।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न-१४-संकलित साखियों और पदों के आधार पर कबीर के धार्मिक और सांप्रदायिक सद्भाव संबंधी विचारों पर प्रकाश डालिए

उत्तर-कबीर दास जी ने अपनी रचनाओं में धार्मिक और सांप्रदायिक कुरीतियों पर गहरा प्रहार किया है। उन्होंने जाति-पांति, ऊँच-नीच, और धर्म-संप्रदाय के बाहरी आडंबरों का कड़ा विरोध किया। उनका कहना है कि ईश्वर न तो मंदिर में मिलते हैं और न ही मस्जिद में। हमें काशी या काबा जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ईश्वर तो कण-कण में उपस्थित हैं और हर व्यक्ति के अंदर वही परमपिता समाया हुआ है।

कबीर दास जी बताते हैं कि पक्ष-विपक्ष, तेरा-मेरा, पूजा-पाठ या तंत्र-मंत्र करने से प्रभु की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए, सच्चे मन और निष्काम भाव से प्रभु की आराधना करनी चाहिए। उनके अनुसार, ईश्वर की सच्ची भक्ति ही मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाती है।

भाषा अध्ययन

प्रश्न-१५--निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए-
पखापखी, अनत, जोग, जुगति, बैराग, निरपख.


उत्तर-   पखापखी    –   पक्ष-विपक्ष
            अनत         –  अन्यत्र
             जोग          –   योग
             जुगति       –   युक्ति
             बैराग        –   वैराग्य
             निष्पक्ष      –  निरपख





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