"NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter 7 - Sakhiyan and Sabad: Explanation and Questions & Answers"
कबीर दास की साखियाँ-
कबीर दास की साखियाँ दोहा छंद में रची गई हैं, जो "आँखों देखी" अनुभव को दर्शाती हैं। यह शब्द संस्कृत के "साक्षी" से लिया गया है, जिसका मतलब है किसी चीज को प्रत्यक्ष रूप से देखना या अनुभव करना। कबीरदास जी ने अपनी साखियों में भक्ति और ज्ञान के मार्ग पर जोर दिया है।
इन साखियों में कबीरदास हमें बताते हैं कि इस संसार में मनुष्य को कैसे रहना चाहिए और कैसे ईश्वर को बिना बाहरी आडंबरों के प्राप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार, सच्चा सुख केवल ईश्वर भक्ति में है, जो सच्चे ज्ञान के साथ ही संभव है। कबीर की साखियाँ भक्ति और ज्ञान के उपदेशों का संकलन हैं जो हमें सरल और सच्चे जीवन की दिशा दिखाती हैं।
साखियाँ का भावार्थ -
👉मानसरोवर सुभग जल , हंसा केलि कराहि।
मुकताफल मुकता चुगै , अब उड़ी अनत न जाही।१।
भावार्थ –
यह एक दोहा छंद है।
कैलाश पर्वत पर स्थित मानसरोवर झील का जल पूरी तरह से स्वच्छ और निर्मल है, जहाँ हंस (पक्षी)निवास करता है। हंस उसी मानसरोवर झील में मोती जैसे दानों का सेवन करता है और आनंद से क्रीड़ा करते हुए अपना जीवन व्यतीत करता है। हंस को उस झील से बाहर जाने की आवश्यकता या इच्छा नहीं होती।
कबीरदास जी ने इस दोहे में इसी भावना को व्यक्त किया है। वे कहते हैं कि जब मनुष्य ईश्वर भक्ति में पूरी तरह से डूब जाता है, तब उसका हृदय भी निर्मल हो जाता है। इस स्थिति में, जब मनुष्य हृदय रूपी मानसरोवर में साधना रूपी क्रीड़ा कर रहा होता है और भक्ति रूपी मोती चुगकर आनंदित हो रहा होता है, तो फिर वह ईश्वर की भक्ति को छोड़कर कहीं और जाने की इच्छा नहीं करता।
दूसरे शब्दों में, जब किसी व्यक्ति का मन ईश्वर भक्ति में लग जाता है, तो उसे सांसारिक इच्छाओं, मोह-माया, और बाहरी आडंबरों से कोई संबंध नहीं रह जाता। उसे केवल ईश्वर भक्ति में ही सच्चा आनंद और खुशी मिलती है, और वह भक्ति के मार्ग को छोड़कर किसी अन्य मार्ग पर नहीं जाना चाहता। इस दोहे में शांत रस का प्रभाव प्रकट किया गया है।
👉प्रेमी ढ़ूँढ़त मैं फिरौं , प्रेमी मिले न कोई।
प्रेमी कों प्रेमी मिले , सब विष अमृत होइ।२।
भावार्थ –
कबीरदास जी कहते हैं कि वे अपने प्रेमी (ईश्वर) को हर जगह खोजते फिर रहे हैं, लेकिन उन्हें कहीं भी उनका प्रेमी (ईश्वर) नहीं मिल रहा है।
कबीरदास जी का कहना है कि यदि उन्हें उनके ईश्वर के रूप में प्रेमी मिल जाए, तो उनके मन का सारा विष (दुख और कठिनाई) अमृत (सुख) में बदल जाएगा। इसका अर्थ है कि भगवान की भक्ति के माध्यम से ही सभी दुखों का अंत होता है और सुख की प्राप्ति होती है।
👉हस्ती चढ़िए ज्ञान कौं , सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है , भूँकन दे झक मारि।३।
भावार्थ –
कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य को हमेशा ज्ञान के हाथी पर साधना के आसन (गलीचा) को बिछाकर सवारी करनी चाहिए।
वे उदाहरण देते हैं कि जैसे हाथी कुत्तों के भौंकने की परवाह किए बिना अपनी मस्ती में आगे बढ़ता है, वैसे ही इस संसार के लोग भी आपको अच्छा या बुरा कहेंगे। आपको उनकी बातों को अनसुना करते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए। समय के साथ, वे सभी थक हारकर चुप हो जाएंगे। यहां कबीरदास जी ने संसार की तुलना भौंकने वाले कुत्तों से की है, यह दर्शाते हुए कि दूसरों की बातों को नजरअंदाज करके हमें अपने मार्ग पर चलते रहना चाहिए।
निरपख होई के हरि भजै , सोई संत सुजान।४।
कहै कबीर सो जीवता , दुहूँ के निकटि न जाइ।५।
मोट चुन मैदा भया , बैठी कबीरा जीम।६।
सुबरन कलस सुरा भरा , साधु निंदा सोई।७।
सबद (पद) का भावार्थ -
ना तो कौने क्रिया -कर्म में , नहीं योग वैराग में।
खोजी होय तो तुरते मिलिहों , पल भर की तलास में।
कहें कबीर सुनो भाई साधो , सब स्वासों की स्वास में।
भ्रम की टाटी सबै उड़ाँनी , माया रहै न बाँधी॥
हिति चित्त की द्वै थूँनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।
त्रिस्नाँ छाँनि परि घर ऊपरि, कुबधि का भाँडाँ फूटा।
जोग जुगति काया का निकस्या, हरि की गति जब जाँणी॥
आँधी पीछै जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।
कहै कबीर भाँन के प्रगटे उदित भया तम खीनाँ॥
NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter -७ साखियाँ एवं सबद : प्रश्नोत्तर
Sakhiyan and Sabad:Questions &
Answer
(साखियाँ)पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
प्रश्न-१-'मानसरोवर’ से कवि का क्या आशय है?
उत्तर-मानसरोवर के दो अर्थ हैं-
- एक पवित्र सरोवर जिसमें हंस विहार करते हैं।
- दूसरा हृदय रूपी तालाब से है जो ईश्वर भक्ति से निर्मल हो चुका है।
उत्तर-इस दोहे में अनुभव से प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान को महत्त्व दिया गया है।
उत्तर-इस संसार में सच्चा संत वही है जो जाति-धर्म, संप्रदाय आदि के भेदभाव से दूर रहता है, तर्क-वितर्क, वैर-विरोध और राम-रहीम के चक्कर में पड़े बिना प्रभु की सच्ची भक्ति करता है। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा संत होता है।
उत्तर-अंतिम दो दोहों में कबीर ने निम्नलिखित संकीर्णताओं की ओर संकेत किया है-
- कबीरदास जी पहले दोहे में कहते हैं कि चाहे इंसान ईश्वर को काबा में खोजे या काशी में, या फिर उसे राम के नाम से पुकारे या रहीम के नाम से, ईश्वर सभी के लिए एक ही है। अपने धर्म या पंथ को श्रेष्ठ मानकर दूसरों के धर्म या ईश्वर की निंदा करना एक संकीर्ण सोच को दर्शाता है।
- दूसरे दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि किसी ऊँचे कुल में जन्म लेने से मनुष्य महान नहीं बनता, बल्कि उसके कर्म ही उसे ऊँचा बनाते हैं। असली पहचान उसके अच्छे कर्मों से होती है, न कि उसके कुल से। ऊंचे कुल में जन्म लेने मात्र से खुद को श्रेष्ठ मानना एक संकीर्ण सोच को दर्शाता है।
हस्ती चढ़िए ज्ञान कौ, सहज दुलीचा डारि।
स्वान रूप संसार है, भेंकन दे झख मारि।
सबद (पद)पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
उत्तर-मनुष्य ईश्वर को विभिन्न स्थानों पर ढूँढ़ता फिरता है। कोई उसे काबा में खोजता है, कोई काशी में, तो कोई उसे राम के नाम से पुकारता है, और कोई रहीम के नाम से। लोग अपने-अपने धर्म और मान्यताओं के अनुसार ईश्वर को अलग-अलग जगहों और रूपों में खोजने की कोशिश करते हैं, लेकिन वास्तव में ईश्वर सभी में समान रूप से मौजूद है।
उत्तर-कबीर दास जी ने ज्ञान के आगमन की तुलना आँधी से की है, क्योंकि आँधी बहुत तेज़ और प्रभावी होती है। यह अपनी राह में आने वाली सभी रुकावटों को हटा देती है। इसी तरह, ज्ञान भी हमारे जीवन में बदलाव लाता है। जब हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो यह हमारे अज्ञान को समाप्त करता है और हमें नई सोच और दृष्टिकोण देता है।
(क) हिति चित्त की वै श्रृंनी गिराँनी, मोह बलिंडा तूटा।
उत्तर-कबीर दास जी ने अपनी रचनाओं में धार्मिक और सांप्रदायिक कुरीतियों पर गहरा प्रहार किया है। उन्होंने जाति-पांति, ऊँच-नीच, और धर्म-संप्रदाय के बाहरी आडंबरों का कड़ा विरोध किया। उनका कहना है कि ईश्वर न तो मंदिर में मिलते हैं और न ही मस्जिद में। हमें काशी या काबा जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि ईश्वर तो कण-कण में उपस्थित हैं और हर व्यक्ति के अंदर वही परमपिता समाया हुआ है।
पखापखी, अनत, जोग, जुगति, बैराग, निरपख.
अनत – अन्यत्र
जोग – योग
जुगति – युक्ति
बैराग – वैराग्य
निष्पक्ष – निरपख
