"NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter 8 - ललद्यद के वाख : भावार्थ और प्रश्नोत्तर"

 "NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter 8-Laldyad Ke Vaakh: Explanation and Questions & Answers"

ललद्यद के वाख का भावार्थ


👉 रस्सी कच्चे धागे की , खींच रही मैं नाव।
      जाने कब सुन मेरी पुकार , करें देव भवसागर पार।
      पानी टपके कच्चे सकोरे , व्यर्थ प्रयास हो रहे मेरे।
      जी में उठती रह-रह हूक , घर जाने की चाह है घेरे।।


भावार्थ-


इस काव्य खंड में कवयित्री ने अपनी जीवन यात्रा की तुलना नाव से और अपनी सांसों की तुलना कच्ची डोरी से की है। वह कहती हैं कि वह अपनी जिंदगी रूपी नाव को सांसों रूपी इस कमजोर डोरी से खींच रही हैं, अर्थात जैसे-तैसे जीवन गुजार रही हैं। उन्हें नहीं पता कि प्रभु कब उनकी विनम्र पुकार सुनकर इस संसार के जन्म-मरण रूपी भवसागर से पार ले जाएँगे। 


आगे, कवयित्री अपने शरीर को एक कच्चे मिट्टी के घड़े के समान मानती हैं, जिसमें से लगातार पानी रिस रहा है। इसका अर्थ है कि हर गुजरते दिन के साथ उनकी उम्र कम होती जा रही है, और प्रभु तक पहुँचने के उनके सभी प्रयास निरर्थक प्रतीत हो रहे हैं। 


कवयित्री कहती हैं कि उनका हृदय बार-बार प्रभु से मिलने को व्याकुल हो उठता है। उनके मन में घर जाने की तीव्र इच्छा है, जिसका अर्थ यहाँ अपने परमात्मा में विलीन होने की चाह है। कवयित्री का भाव यह है कि अब उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य प्रभु की शरण में जाना है, जो उनके जीवन को सार्थक बना सके।




👉 खा खा कर कुछ पाएगा नहीं ,
      न खाकर बनेगा अहंकारी।

      सम खा तभी होगा समभावी ,
      खुलेगी साँकल बन्द द्वार की।



भावार्थ-


इस काव्य खंड में कवयित्री ने जीवन में संतुलन बनाए रखने की महत्ता बताई है और मध्यम मार्ग अपनाने की सलाह दी है। कवयित्री कहती हैं कि मनुष्य को न तो पूरी तरह से भौतिक सुख-सुविधाओं में डूबना चाहिए और न ही सब कुछ छोड़कर वैराग्य धारण करना चाहिए। यदि व्यक्ति पूरी तरह से सांसारिक चीजों में लिप्त रहता है, तो वह आत्मकेंद्रित बन जाएगा और कोई भी स्थायी संतोष नहीं मिलेगा। 


इसी तरह, अगर वह सब कुछ त्यागकर केवल वैराग्य की राह अपनाता है, तो वह अहंकारी बन सकता है। 


कवयित्री का मानना है कि जीवन में संतुलन होना चाहिए। थोड़ा भोग और थोड़ा वैराग्य – दोनों को समान रूप से अपनाना चाहिए। इस संतुलन से मन में समानता की भावना आएगी, और दूसरों के प्रति प्रेम, दया, और उदारता का भाव जाग्रत होगा। इससे मन की सारी दुविधाएँ दूर होंगी, और हम सभी को खुले दिल से अपनाने के लिए तैयार रहेंगे।




👉 आई सीधी राह से , गई न सीधी राह।
       सुषुम-सेतु पर खड़ी थी , बीत गया दिन आह

       ज़ेब टटोली कौड़ी ना पाई।
       माझी को दूँ  , क्या उतराई ?



भावार्थ-


इस काव्य खंड में कवयित्री अपने कर्मों पर पछतावा कर रही हैं। वह कहती हैं कि जब वह इस दुनिया में आई थीं, तब उनका मन एकदम पवित्र और निर्मल था। उस समय उनके दिल में किसी के प्रति राग-द्वेष की भावना नहीं थी। लेकिन अब जब जाने का समय आ रहा है, तो उनका मन छल-कपट, भेदभाव और सांसारिक मोह-माया से भर गया है। 


उन्होंने परमात्मा को पाने के लिए सीधा रास्ता अपनाने के बजाय हठयोग का मार्ग चुना। अपने और परमात्मा के बीच एक सेतु बनाने के लिए उन्होंने कुंडली योग को जागृत करने का सहारा लिया, लेकिन इस प्रयास में वे असफल रहीं। अब जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ है, तो बहुत देर हो चुकी है। वे मृत्यु के निकट पहुंच चुकी हैं। 


कवयित्री आगे कहती हैं कि जब वे अपनी जिंदगी का हिसाब करने बैठती हैं, तो उन्हें अपनी झोली खाली नजर आती है। उन्हें लगता है कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में कोई पुण्य कर्म या अच्छे कर्म नहीं किए, और अब पुण्य कर्म करने का समय भी खत्म हो चुका है। परमात्मा से मिलने का समय भी बहुत पास आ चुका है। 


वह सोचती हैं कि जब परमात्मा उन्हें इस जन्म-मरण के भवसागर से पार उतारेंगे, तो वे उन्हें मेहनताने के रूप में क्या भेंट स्वरूप देंगी? यह भाव उनके अंतर्मन की गहरी चिंता और खेद को दर्शाता है।



👉 थल थल में बसता है शिव ही,
      भेद न कर क्या हिन्दू-मुसलमां।

      ज्ञानी है तो स्वयं को जान ,
      यही है साहिब से पहचान।।



भावार्थ-


इस काव्य खंड में कवयित्री यह बताती हैं कि ईश्वर हर जगह विद्यमान है और सभी के हृदय में बसता है। इसलिए हमें हिंदू और मुसलमान के बीच भेदभाव नहीं रखना चाहिए। 


कवयित्री आगे कहती हैं कि अगर तुम सच में ज्ञानी हो, तो सबसे पहले अपने अंदर झांककर देखो। अपने आप को पहचानो और अपने मन को पवित्र और निर्मल बनाओ। यही एकमात्र रास्ता है जिससे तुम ईश्वर से मिल सकते हो। इस प्रकार, कवयित्री हमें आंतरिक आत्मनिरीक्षण और शुद्धता की आवश्यकता पर जोर देती हैं।


"NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter 8-Laldyad Ke Vaakh:Questions & Answers"


ललद्यद के वाख कक्षा 9 के प्रश्न उत्तर


प्रश्न-१-‘रस्सी’ यहाँ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है और वह कैसी है?


उत्तर-यहाँ 'रस्सी' का प्रयोग मनुष्य की श्वासों के प्रतीक के रूप में हुआ है, जो उसके शरीर या जीवन रूपी नाव को खींच रही हैं। कवयित्री के अनुसार यह रस्सी बहुत ही कमजोर है और किसी भी समय टूट सकती है, जिससे जीवन का अंत हो सकता है।


प्रश्न-२-कवयित्री द्वारा मुक्ति के लिए किए जाने वाले प्रयास व्यर्थ क्यों हो रहे हैं?


उत्तर-कवयित्री के अनुसार, उनके मुक्ति के प्रयास इसलिए व्यर्थ हो रहे हैं क्योंकि वे सांसारिक मोह-माया और भौतिक साधनों में उलझी हुई हैं। उन्होंने परमात्मा को पाने के सरल भक्ति मार्ग को अपनाने के बजाय, कठिन साधनाओं का रास्ता चुना, जो उनके लिए प्रभावी नहीं हो पाया। इस कारण उनके प्रयास सफल नहीं हो रहे और उन्हें शांति नहीं मिल पा रही।


प्रश्न-३-कवयित्री का ‘घर जाने की चाह’ से क्या तात्पर्य है?


उत्तर-कवयित्री का ‘घर जाने की चाह’ से तात्पर्य परमात्मा में लीन होने या मोक्ष प्राप्ति से है। वह संसार के दुखों और बंधनों से मुक्त होकर अपने वास्तविक उद्देश्य, यानी ईश्वर से मिलन की ओर लौटना चाहती हैं। उनका मन अब सांसारिक जीवन से विरक्त होकर शांति और आत्मिक मिलन की ओर उन्मुख हो गया है।


प्रश्न-४-भाव स्पष्ट कीजिए-
          (क) जेब टटोली कौड़ी न पाई।


उत्तर-इस पंक्ति में कवयित्री कहती हैं कि उन्होंने अपने जीवन का मूल्यांकन किया और पाया कि उनके पास कोई सच्चा पुण्य कर्म या आध्यात्मिक पूंजी नहीं है। 'जेब टटोलने' का अर्थ है आत्मचिंतन करना, और 'कौड़ी न पाई' का तात्पर्य यह है कि उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो उन्हें परमात्मा से मिलन में सहायक हो सके। जीवन में केवल सांसारिक चीजों में उलझकर उन्होंने असली उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया, जिससे अब उन्हें खालीपन का अनुभव हो रहा है।


        (ख) खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं, न खाकर बनेगा अहंकारी।


उत्तर-इस पंक्ति में कवयित्री कहती हैं कि अधिक भोग-विलास या सांसारिक सुखों में लिप्त रहने से कुछ भी हासिल नहीं होगा, और सबकुछ त्याग देने या कठोर तप में जाने से व्यक्ति अहंकारी बन सकता है। वह यह संदेश देना चाहती हैं कि जीवन में संतुलन बनाकर चलना आवश्यक है। न तो अत्यधिक भोग में डूबना ठीक है और न ही पूरी तरह त्याग करना। संतुलित जीवन ही सच्चे आत्मिक विकास का मार्ग है।




प्रश्न-५-बंद द्वार की साँकल खोलने के लिए ललयद ने क्या उपाय सुझाया है?


उत्तर-कवयित्री के अनुसार, "बंद द्वार की साँकल खोलने" का अर्थ है कि- हमें अपने हृदय के दरवाजे सभी के लिए खोलने चाहिए और सभी को एक समान भाव से देखना चाहिए। वह कहती हैं कि जीवन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। जब हम संतुलित तरीके से जीते हैं, तो हमारे मन में समानता का भाव जागृत होता है, और इससे प्रेम, दया, करुणा, और उदारता जैसी भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। राग-द्वेष और तेरा-मेरा जैसी भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं, और हम अपने दिल के द्वार सभी के लिए समान रूप से खोल पाते हैं।


प्रश्न-६-ईश्वर प्राप्ति के लिए बहुत से साधक हठयोग जैसी कठिन साधना भी करते हैं, लेकिन उससे भी लक्ष्य प्राप्ति नहीं होती। यह भाव किन पंक्तियों में व्यक्त हुआ है?


उत्तर-उपर्युक्त भाव प्रकट करने वाली पंक्तियाँ हैं-


“आई सीधी राह से, गई न सीधी राह।”– साधक सही रास्ते पर चलकर भी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाता।  

“सुषुम-सेतु पर खड़ी थी, बीत गया दिन आह!”– साधना में समय बर्बाद हो जाता है, फिर भी सफलता नहीं मिलती।  

“जेब टटोली, कौड़ी न पाई।” – बहुत प्रयास के बावजूद कुछ प्राप्त नहीं होता।  

“मांझी को क्या दें, क्या उतराई?”– साधक को मुक्ति में कोई सफलता नहीं मिलती।


प्रश्न-७-‘ज्ञानी’ से कवयित्री का क्या अभिप्राय है?


उत्तर-‘ज्ञानी’ से कवयित्री का अभिप्राय उस व्यक्ति से है जिसने बाहरी ज्ञान के बजाय आत्मज्ञान को पहचाना हो। वह व्यक्ति अपने भीतर की शांति और सत्य को समझता है, न कि केवल धार्मिक कृत्यों से।


 रचना और अभिव्यक्ति 


प्रश्न-८-हमारे संतों, भक्तों और महापुरुषों ने बार-बार चेताया है कि मनुष्यों में परस्पर किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होता, लेकिन आज भी हमारे समाज में भेदभाव दिखाई देता है-


(क) आपकी दृष्टि में इस कारण देश और समाज को क्या हानि हो रही है?


उत्तर-भेदभाव समाज में असमानता और नफरत का कारण बनता है, जिससे लोग एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं। यह मानसिकता समाज में संघर्ष, अविश्वास और अलगाव को बढ़ावा देती है। जब हम जाति, धर्म, रंग, या अन्य भेदों के आधार पर किसी को नीचा या ऊँचा समझते हैं, तो हम मानवता और समानता के सिद्धांतों को कमजोर करते हैं। इस प्रकार, समाज में भेदभाव से लोग एकजुट नहीं हो पाते और सामाजिक विकास में बाधाएं आती हैं। इसके कारण सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ बढ़ती हैं, जो राष्ट्र की प्रगति में रुकावट डालती हैं।


(ख) आपसी भेदभाव को मिटाने के लिए अपने सुझाव दीजिए।


उत्तर-आपसी भेदभाव को समाप्त करने के लिए लोगों को सहनशील और समझदार बनना होगा। सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान की भावना को बढ़ावा देना चाहिए और कट्टरता को छोड़कर धार्मिक सौहार्द्र का माहौल बनाना होगा। प्रत्येक धर्म के अनुयायियों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए और चुनावी लाभ के लिए किसी विशेष धर्म का पक्षपाती व्यवहार नहीं करना चाहिए, ताकि दूसरे धर्म के लोग उपेक्षित महसूस न करें।


पाठेत्तर सक्रियता 


प्रश्न-९-भक्तिकाल में ललद्द्यद के अतिरिक्त तमिलनाडु की आंदाल, कर्नाटक की अक्क महादेवी और राजस्थान की मीरा जैसी भक्त कवयित्रियों के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए एवं उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के बारे में कक्षा में चर्चा कीजिए।

उत्तर-परीक्षापयोगी नहीं है। 


प्रश्न-१०-ललयद कश्मीरी कवयित्री हैं। कश्मीर पर एक अनुच्छेद लिखिए।


उत्तर-कश्मीर हमारे देश के उत्तर में स्थित एक पर्वतीय प्रदेश है, जहाँ की भूमि ऊँची-नीची है। यहाँ के ऊँचे पहाड़ों पर सर्दियों में बर्फ़ पड़ती है। कश्मीर हिमालय की गोदी में बसा हुआ एक बहुत सुंदर प्रदेश है। इसकी सुंदरता ने मुग़ल सम्राटों को भी आकर्षित किया, और एक बार मुग़ल सम्राज्ञी ने कहा था, "यदि धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो वह यहीं है।"


कश्मीर में झेलम, सिंधु जैसी नदियाँ बहती हैं, जो यहाँ की हरियाली को बनाए रखती हैं। यहाँ के हरे-भरे जंगल, सेब के बाग, खूबसूरत घाटियाँ और डल झील, जिसमें तैरते खेत, शिकारे और हाउसबोट होते हैं, ये सभी सैलानियों के आकर्षण का कारण बनते हैं। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता को देखने के लिए केवल देश से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी पर्यटक आते हैं। कश्मीर का पर्यटन उद्योग राज्य की आय में महत्वपूर्ण योगदान करता है। कश्मीर जितना सुंदर है, यहाँ के लोग भी उतने ही अच्छे और मिलनसार हैं। कश्मीर वासी मृदुभाषी, हँसमुख और परिश्रमी होते हैं। कश्मीर वास्तव में धरती का स्वर्ग है।


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