"NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter 11: GRAM SHREE: Explanation and Questions & Answers''
ग्रामश्री का भावार्थ
लिपटीं जिससे रवि की किरणें
चाँदी की सी उजली जाली !
तिनकों के हरे हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक ,
श्यामल भू तल पर झुका हुआ
नभ का चिर निर्मल नील फलक !
भावार्थ -कवि खेतों में फैली हरियाली को देखकर उसकी सुंदरता का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि जहां तक नजर जाती है, वहां तक खेतों में मखमल जैसी कोमल हरियाली फैली हुई है। इस हरियाली पर जब सूर्य की किरणें पड़ती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो चाँदी की चमकदार जाली ने उसे ढक लिया हो।
नये-नये उगे हरे-भरे तिनकों और पत्तियों पर पड़ी ओस की बूंदें, उनमें जीवन का आभास कराती हैं। कवि को ऐसा प्रतीत होता है जैसे इन तिनकों में हरा रक्त (रुधिर) बह रहा हो। यहां कवि ने प्रकृति की हरियाली को सजीवता प्रदान करते हुए उसकी ऊर्जा और सौंदर्य को व्यक्त किया है।
पूरी प्रकृति को निहारते हुए कवि को यह भी महसूस होता है कि धरती के श्यामल (सांवले) स्वरूप को ऊपर फैला स्वच्छ और निर्मल नीला आकाश ढककर उसे और भी सुंदर बना रहा है। ऐसा लगता है मानो धरती और आकाश एक-दूसरे के पूरक बनकर इस अद्भुत दृश्य को संपूर्णता प्रदान कर रहे हों। यह दृश्य प्रकृति की सौम्यता, शांति, और दिव्यता को बड़े ही सुंदर ढंग से चित्रित करता है।
आई जौ गेहूँ में बाली,
अरहर सनई की सोने की
किंकिणियाँ हैं शोभाशाली !
उड़ती भीनी तैलाक्त गंध
फूली सरसों पीली पीली ,
लो , हरित धरा से झाँक रही
नीलम की कलि , तीसी नीली !
अरहर (एक प्रकार की दाल) और सनई (एक रेशेदार पौधा , जो रस्सी बनाने के काम आता हैं) के पौधे सुनहरे रंग की घंटियों (किंकिणियों) की तरह लगते हैं, जो खेतों की शोभा को बढ़ा रहे हैं। पीले फूलों से भरी हुई सरसों की फसल से एक भीनी-भीनी तैलीय सुगंध उड़ती है, जो वातावरण को महकाती है।
हरे-भरे खेतों के बीच से झांकती नीले रंग की तीसी (अलसी का पौधा)के फूल नीलम रत्न की कलियों के समान दिखते हैं, जो धरती के सौंदर्य को और भी अद्भुत बना देते हैं। इस प्रकार, कवि ने प्रकृति और खेती के इस दृश्य को अत्यंत मनोरम और आकर्षक रूप में चित्रित किया है।
👉रंग रंग के फूलों में रिलमिल
हंस रही सखियाँ मटर खड़ी ,
मखमली पेटियों सी लटकीं
छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी !
फिरती है रंग रंग की तितली
रंग रंग के फूलों पर सुंदर ,
फूले फिरते है फूल स्वयं
उड़ उड़ वृंतों से वृंतों पर !
भावार्थ-कवि कहते हैं कि खेतों में मटर के पौधों पर खिले नीले और सफेद रंग के फूलों को देखकर ऐसा लगता है, जैसे दो सखियां आपस में हंसी-मजाक करते हुए खिलखिला रही हों। मटर के पौधों का मानवीकरण करते हुए कवि ने उनकी सुंदरता और चंचलता को जीवंत रूप दिया है।
मटर की बेल पर लटकी फलियां मखमल की पेटियों जैसी प्रतीत होती हैं, जिनके भीतर बीजों की लड़ियां छिपी हुई हैं। ऐसा लगता है मानो ये बेलें अपनी अंदरूनी संपदा को सहेजकर बड़ी ही कोमलता से संभाल रही हों।
बसंत ऋतु के आगमन से खेतों में खिले रंग-बिरंगे फूलों पर सुंदर तितलियां उड़ती हुई दृश्य को और भी आकर्षक बना रही हैं। जब हवा फूलों को हिलाती है, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे फूल खुद उड़कर एक डंठल से दूसरी डंठल पर जाकर बैठ रहे हों। यह दृश्य फूलों की खुशी और मस्ती को दर्शाता है, मानो पूरी प्रकृति बसंत की छटा में झूम रही हो।
👉अब रजत स्वर्ण मंजरियों से
लद गई आम्र तरु की डाली,
झर रहे ढ़ाक , पीपल के दल ,
हो उठी कोकिला मतवाली !
महके कटहल, मुकुलित जामुन ,
जंगल में झरबेरी झूली ,
फूले आड़ू , नीम्बू , दाड़िम
आलू , गोभी , बैगन , मूली !
भावार्थ-कवि प्रकृति के सौंदर्य और वसंत ऋतु की छटा का वर्णन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि आम के पेड़ों की डालियां रजत (चांदी) और स्वर्ण (सोने) जैसी चमकती मंजरियों से लद गई हैं, जो फसल के आगमन और समृद्धि का संकेत देती हैं।
ढाक और पीपल के पेड़ों से पत्ते झरने लगे हैं, और कोयल की मधुर कूक ने जैसे वसंत ऋतु के उल्लास में उसे मतवाला बना दिया है।
कटहल के पेड़ों से भीनी-भीनी महक आ रही है, जामुन के पेड़ पर कलियां खिल गई हैं, और झरबेरी के पेड़ जंगल में झूलते हुए अपनी सुंदरता बिखेर रहे हैं।
इसके साथ ही, आड़ू, नींबू, अनार (दाड़िम) जैसे फलों के पेड़ फूलों से भर गए हैं। खेतों में आलू, गोभी, बैंगन, और मूली की फसलें भी लहलहा रही हैं। इस प्रकार, कवि ने वसंत ऋतु में प्रकृति की समृद्धि, हरियाली और जीवन के उल्लास का मनोहारी चित्रण किया है।
👉पीले मीठे अमरूदों में
अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं ,
पक गये सुनहले मधुर बेर ,
अँवली से तरु की डाल जड़ी!
लहलह पालक, महमह धनिया ,
लौकी औ’ सेम फलीं , फैलीं
मखमली टमाटर हुए लाल ,
मिरचों की बड़ी हरी थैली !
भावार्थ-कवि ने इस पंक्ति में प्रकृति और फसलों के सौंदर्य का मनोहारी वर्णन किया है। वे कहते हैं कि अमरूद अब पककर पीले और मीठे हो गए हैं, और उन पर लाल-लाल चित्तियां (धब्बे) पड़ गई हैं, जो उनकी मिठास और परिपक्वता को दर्शाती हैं।
सुनहरे और मीठे बेर भी पूरी तरह पक चुके हैं, और आंवले के पेड़ों की डालियां फलों से लद गई हैं, जो वसंत ऋतु के समृद्धि और फलदायी स्वरूप को उजागर करती हैं।
खेतों में पालक लहलहा रहा है, और धनिया अपनी खुशबू से वातावरण को महका रही है। लौकी और सेम की बेलें खूब फली-फूली हुई हैं, जो खेतों की हरियाली को और बढ़ा रही हैं।
टमाटर पककर लाल हो गए हैं, और मिर्च के पौधों पर बड़ी-बड़ी हरी मिर्चों से भरी थैलियां दिखाई दे रही हैं। इस प्रकार, कवि ने फलों, सब्जियों और हरियाली के माध्यम से प्रकृति की विविधता, समृद्धि, और ताजगी का सुंदर चित्रण किया है।
👉बालू के साँपों से अंकित
गंगा की सतरंगी रेती
सुंदर लगती सरपत छाई
तट पर तरबूजों की खेती ;
अँगुली की कंघी से बगुले
कलँगी सँवारते हैं कोई ,
तिरते जल में सुरखाब , पुलिन पर
मगरौठी रहती सोई !
भावार्थ-कवि ने गंगा के तट और उसके आस-पास की प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है। वे कहते हैं कि गंगा की रेती (बालू) पर साँपों की आकृतियाँ उकेरी हुई दिखाई देती हैं, जो पानी की लहरों और बालू के संयोजन से बनी होती हैं, और यह रेती रंग-बिरंगी, आकर्षक लगती है।
सरपत (झाड़ियां) की घनी छांव तट पर फैली हुई है, और वहां तरबूजों की खेती भी हो रही है, जो वातावरण को और अधिक समृद्ध बनाती है।
बगुले, जो अपनी लंबी चोंच से अपनी कलंगी (संगठित पंखों का गुच्छा) संवारते हैं, वे तट पर अपने सौंदर्य को बढ़ाते हैं। कवि ने बगुलों को मानवीकरण करते हुए उनका सौंदर्य दर्शाया है।
जल में सुरखाब (पक्षी) तैर रहे हैं, और पुलिन (किनारा) पर मगरमच्छ (मगरौठी) आराम से सोई हुई अवस्था में पड़ी है। इस प्रकार, कवि ने गंगा के तट पर फैली सजीवता, शांति और सुंदरता को चित्रित किया है, जहां हर चीज अपनी जगह पर संतुलन और सुंदरता से रहती है।
👉हँसमुख हरियाली हिम-आतप
सुख से अलसाए-से सोये ,
भीगी अँधियाली में निशि की
तारक स्वप्नों में-से खोये-
मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम-
जिस पर नीलम नभ आच्छादन-
निरुपम हिमांत में स्निग्ध शांत
निज शोभा से हरता जन मन !
भावार्थ-इन पंक्तियों में कवि ने अपने गाँव की सुंदरता और प्राकृतिक माहौल का अनूठा वर्णन किया है। कवि अपने गाँव की हरियाली और प्रकृति को देख अभिभूत हो जाते हैं। गाँव की हरियाली मुस्कुराती हुई प्रतीत होती है, और सर्दियों की धूप में यह कभी आलस्य से भरी हुई लगती है, तो कभी शांत और सोई हुई। इस हरियाली पर पड़ी ओस की बूँदें आकाश में टिमटिमाते तारों के समान दिखती हैं, मानो वे अपने में खोए हुए हों।
कवि अपने गाँव की तुलना हरे रंग के बहुमूल्य रत्न 'पन्ना' से भरे डिब्बे से करते हैं, जिसे नीले आकाश की छटा ने ढक रखा है। चारों ओर की लहलहाती फसलें, रंग-बिरंगे फूल, और प्रकृति की यह अकूत संपदा सर्दियों के अंत में गाँव को एक अद्वितीय आकर्षण प्रदान करती है।
ग्राम की यह शांत और स्निग्ध छवि अपने सहज सौंदर्य से सभी का मन मोह लेती है और उन्हें प्रकृति की इस अनुपम कृति के प्रति आभार महसूस करने को प्रेरित करती है।
"NCERT Solutions for Class 9 Hindi Kshitiz Chapter 11: GRAM SHREE: Questions & Answers''
ग्रामश्री के प्रश्नोत्तर
वसंत ऋतु को प्रकृति का सबसे सुंदर और मनमोहक समय माना जाता है। इस ऋतु में चारों ओर हरियाली छा जाती है, फूल खिल उठते हैं, और पेड़-पौधे नई कोपलों से सज जाते हैं। पक्षियों की मधुर चहचहाहट और सुगंधित वातावरण मन को आनंदित कर देते हैं।
प्रश्न-३-गाँव को “मरकत डिब्बे-सा खुला” क्यों कहा गया है ?
उत्तर-गाँव को "मरकत डिब्बे-सा खुला" इसलिए कहा गया है क्योंकि कवि ने गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य की तुलना हरे रंग के मणि (मरकत) से की है
गाँव चारों ओर फैली हरियाली और खुले वातावरण के कारण ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई हरे रंग का चमकता हुआ डिब्बा खुला हो। इस उपमा के माध्यम से कवि ने गाँव की सुंदरता और उसकी ताजगी को व्यक्त किया है।
प्रश्न-४-अरहर और सनई के खेत कवि को कैसे दिखाई देते हैं ?
उत्तर-अरहर (एक प्रकार की दाल) और सनई (रस्सी बनाने वाला रेशेदार पौधा) के पौधे कवि को सुनहरे रंग की घंटियों जैसे प्रतीत होते हैं। ये पौधे खेतों की शोभा को बढ़ाते हैं और उनके सुनहरे फूल खेतों को और भी आकर्षक और सुंदर बना देते हैं। कवि ने इस प्राकृतिक दृश्य को बड़ी सुंदरता और सजीवता से प्रस्तुत किया है।कवि ने इन चिह्नों की तुलना साँपों से की है और गंगा की रेत को सतरंगी कहा है, क्योंकि सूरज की रोशनी पड़ने पर यह रेत अलग-अलग रंगों में चमकती है। यह दृश्य गंगा के किनारे की प्राकृतिक सुंदरता को दर्शाता है, जो मन को आनंदित और मोहित कर देता है।
(ख)समुख हरियाली हिम-आतप
हरियाली को "हँसमुख" कहा गया है, क्योंकि वह जीवन और ताजगी का प्रतीक है। "हिम-आतप" का मतलब ठंडी और गर्माहट भरी मौसम की स्थिति से है, जो संतुलित और सुखदायक अनुभव देती है। इस सुखद वातावरण में प्रकृति मानो आलस्य से भरी हुई शांति का आनंद ले रही हो।
प्रश्न-६-निम्न पंक्तिओं में कौन सा अलंकार है ?
"तिनकों के हरे हरे तन पर
हिल हरित रुधिर है रहा झलक”
उत्तर-"तिनकों के हरे-हरे तन पर" में पुनरुक्ति अलंकार है क्योंकि "हरे-हरे" शब्द बार-बार आया है।
"हिल हरित" में अनुप्रास अलंकार है क्योंकि इसमें "ह" अक्षर की बार-बार आवाज आ रही है।
"तिनकों के हरे-हरे तन पर" में मानवीकरण अलंकार है क्योंकि तिनकों को इंसान की तरह "तन" और भाव दिया गया है।
प्रश्न-७-इस कविता में जिस गाँव का चित्रण हुआ है वह भारत के किस भू-भाग पर स्थित है ?
उत्तर-इस कविता में जिस गाँव का चित्रण किया गया है, वह उत्तर भारत में स्थित है।
कविता में हरियाली, अरहर और सनई के खेत, गंगा के किनारे की रेत, और वसंत ऋतु की सुंदरता का वर्णन किया गया है। ये सब उत्तर भारत के गाँवों की खासियत हैं।
प्रश्न-८-भाव और भाषा की दृष्टि से आपको यह कविता कैसी लगी ? उसका वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर-भाव और भाषा की दृष्टि से यह कविता बहुत सुंदर और प्रभावशाली लगती है।
भाव:कविता में गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य और शांति का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया गया है। कवि ने खेतों, फसलों, और गंगा के किनारे की रेत के माध्यम से ग्रामीण जीवन की सादगी और प्राकृतिक आनंद को दर्शाया है। वसंत ऋतु के उल्लास और हरियाली का चित्रण मन को शांति और प्रसन्नता प्रदान करता है। यह कविता प्रकृति और गाँव के प्रति कवि के गहरे प्रेम और जुड़ाव को दर्शाती है।
भाषा:कविता की भाषा सरल, सुगम और सरस है। इसमें सुंदर उपमाओं, मानवीकरण, और अनुप्रास जैसे अलंकारों का उपयोग हुआ है, जो इसे और भी आकर्षक बनाते हैं। कवि ने अपने शब्दों से ग्रामीण जीवन और प्रकृति की सुंदरता को जीवंत कर दिया है।
कुल मिलाकर, यह कविता पाठकों को ग्रामीण जीवन और प्रकृति की ओर आकर्षित करती है और उसमें छिपे सौंदर्य को महसूस करने का अवसर देती है।
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